बिजयनगर। (खारीतट सन्देश) मकर संक्रांति का पर्व हिन्दुओं के प्रमुख पर्वों में से एक है। प्रतिवर्ष 14 व 15 जनवरी को भारत के सभी राज्यों में अपनी-अपनी परम्परा, संस्कृति व मान्यताओं के अनुसार संक्रांति पर्व मनाया जाता है। संक्रांति से तात्पर्य है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन खिचड़ी व तिल व गुड़ से निर्मित लड्डू खाने और आमजन में बांटने की परम्परा रही है। इस दिन से नई ऋतु का आगमन माना जाता है। मकर संक्रांति पर्व पर धर्म-दान, जप-तप व स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सुहागिनें सुहाग की वस्तुएं व अन्य जरूरत की 13 वस्तुएं दान करती हैं। इसे स्थानीय भाषा में 'तेरूण्डा’ के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि इस किए गए दान पुण्य से व्यक्ति को अवश्य रूप से शुभ फल प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के पर्व को पतंग महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इसके पीछे यहीं वजह बताई गई कि भगवान श्री राम द्वारा मकर संक्रांति पर्व पर पतंग उड़ाने की शुरुआत की गई। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो मकर संक्रांति के साथ ही सूर्य पृथ्वी के उत्तरी गोलाद्र्ध पर चमकना शुरू करता है। इससे दिन बड़े व रातें धीरे-धीरे छोटी होती चली जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति के दिन से जलाशयों में वाष्पन क्रिया शुरू होने लगती है जिसमें स्नान करने से ऊर्जा व स्फूर्ति का संचार होता है। मकर संक्रांति के ही दिन दक्षिण भारत में पोंगल, असम में पिहु व पंजाब में लोहड़ी भी मनाई जाती है।
साभार: डॉ. किरण शर्मा, प्राचार्या, श्री गांधी कन्या महाविद्यालय, गुलाबपुरा